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देश विदेश-क्या तेल के दाम बढ़ाना ज़रूरी है? : आलेख : प्रभात पटनायक, अंग्रेजी से अनुवाद : राजेंद्र शर्मा)

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क्या तेल के दाम बढ़ाना ज़रूरी है?

(आलेख : प्रभात पटनायक, अंग्रेजी से अनुवाद : राजेंद्र शर्मा)

पश्चिम एशिया युद्ध के चलते विश्व बाजार में तेल के दाम बढ़कर 100 डालर प्रति बैरल के भी ऊपर निकल गए हैं। भारत सरकार ने हालांकि कई राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे आने तक घरेलू बाजार में तेल के दामों को यथावत बनाए रखा था, अब तेल उत्पादों की कीमतें बढ़ाना शुरू कर दिया है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक चार चक्र में कीमतें बढ़ायी जा चुकी हैं और इसमें कोई शक नहीं है कि सरकार इन कीमतों में आगे और भी बढ़ोतरी करने जा रही है। और बड़ी संख्या में अर्थशास्त्री, जो सब के सब भाजपायी कुनबे से भी नहीं हैं, विश्व बाजार में तेल की कीमतें बढ़ने का बोझ इस तरह घरेलू उपभोक्ताओं पर ‘‘डाले जाने’’ को ही स्वाभाविक बता रहे हैं, जिसका किया जाना जरूरी है। लेकिन, यह नजरिया अर्थव्यवस्था की कार्य प्रणाली की एक भ्रमित समझ पर टिका हुआ है।

तेल की महंगाई, अन्य कटौतियों से भरपाई

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बुनियादी नुक्ता यह है कि तेल उत्पादों की मांग मूल्य-अनम्य होती है यानी इन उत्पादों की कीमतें बढ़ने से, मांग में उस अनुपात के आस-पास भी कमी नहीं होती है। होता यह है कि इन उत्पादों के उपभोक्ता, अन्य खर्चों में कटौतियां कर के इन उत्पादों पर खर्च करते हैं, ताकि इनकी मांग की पूर्ति यथावत होती रहे।

दूसरे शब्दों में, तेल उत्पादों के दाम में बढ़ोतरी से, इन उत्पादों की मांग में उतनी कमी नहीं होती है, जितनी कि अन्य मालों की मांग में कमी हो जाती है। इस तरह इसका समग्रता में अर्थव्यवस्था पर मंदी पैदा करने वाला असर पड़ता है। इसलिए, तेल-उत्पादों की आपूर्ति में कमी जितनी ज्यादा होगी, उनकी कीमतों में उतनी ही ज्यादा बढ़ोतरी करनी पड़ेगी, तभी इन उत्पादों की मांग में इसके लिए काफी कमी हो पाएगी कि, घटी हुई आपूर्तियों से ही मांग पूरी हो जाए। और इसलिए, अन्य खर्चों में से काटकर इन उत्पादों पर खर्चा किए जाने के चलते, अर्थव्यवस्था में उतनी ही तीव्र मंदी भी आएगी।

जाहिर है कि ज्यादातर तो कीमतों के बढ़ने के पीछे, आपूर्तियों की वास्तविक तंगी का होना भी जरूरी नहीं होता है। अक्सर तो पहले से मौजूद भंडारों का निकाला जाना ही, आपूर्ति को जारी रखने के लिए काफी होता है, जैसा कि मोटे तौर पर वर्तमान युद्ध के संदर्भ में हुआ भी है। लेकिन, आने वाले दिनों में आपूर्ति की तंगी होने और कीमतें बढ़ने की प्रत्याशा ही है, जो वास्तविक कीमतों को ऊपर चढ़ा देती है। फिर भी हम यह माने लेते हैं कि आपूर्तियों में वाकई कुछ कमी हुई है, जिसने विश्व बाजार में तेल के दाम को ऊपर धकेल दिया है।

मंदी लाने का रास्ता या रोज़गार बढ़ाने का

अब विश्व बाजार में तेल के दाम में इस तरह की बढ़ोतरी पर, किसी देश के अंदर दो नीतिगत रास्तों में से किसी एक को अपनाया जा सकता है। पहला रास्ता तो यही है कि तेल उत्पादों की और उन सभी उत्पादों की भी, जिनके उत्पादन में लागत के रूप में ये तेल उत्पाद जुड़ते हैं, कीमतों को इस हद तक बढ़ने दिया जाए कि इस मूल्य वृद्धि तथा इससे पैदा होने वाली मंदी, दोनों के प्रभाव के योग से इन उत्पादों की मांग में ही इतनी कमी हो जाए कि घटी हुई आपूर्ति ही पूरी पड़ जाए। इस विकल्प में मंदी न सिर्फ अपरिहार्य है, बल्कि वास्तव में वह तो उन साधनों में से एक है, जिनके जरिए, मांग को ही घटाकर, घटी हुई आपूर्ति के स्तर पर लाया जाता है।

दूसरा नीतिगत रास्ता यह हो सकता है कि तेल उत्पादों की घरेलू बाजार में कीमतें नहीं बढ़ायी जाएं तथा इस तरह घरेलू कीमतों के स्तर को ऊपर नहीं धकेला जाए। इसके बजाए, इस तरह के उत्पादों की आपूर्ति की राशनिंग कर दी जाए, जिससे तेल उत्पादों पर खर्चा पूरा करने के लिए अन्य खर्चों में कटौती किए जाने की स्थिति ही पैदा नहीं हो और इस तरह मंदी का कोई कारण ही नहीं बने। और राशनिंग इस प्रकार की जा सकती है कि तेल उत्पादों के अंतिम उपभोग में ही कटौती हो और उसमें भी संपन्नतर तबकों द्वारा अंतिम उपभोग और अन्य उत्पादों के लिए लागत के रूप में इन उत्पादों के उपयोग में कटौती नहीं हो।

दूसरा रास्ता अपनाए जाने पर होगा यह कि तेल उत्पादों के अंतिम उपभोग में चूंकि राशनिंग के जरिए कटौती हो रही होगी, इस तरह उपभोक्ताओं के हाथों में कुछ क्रय शक्ति बच रही होगी, जिसका उपयोग वे अन्य घरेलू रूप से उत्पादित मालों को खरीदने में करेंगे और इन मालों की मांग बढ़ेगी तथा इसलिए उनके उत्पादन तथा रोजगार में बढ़ोतरी हो रही होगी।

इस तरह, जहां पहला रास्ता मंदी तथा बेरोजगारी पैदा करने वाला रास्ता है, बाद वाले रास्ते में इसकी संभावना छुपी रहती है कि रोजगार तथा उत्पादन में बढ़ोतरी हो।

लक्षित राशनिंग यानी आयात प्रतिस्थापन

पहली नजर में यह दावा बेतुका लग सकता है। यह कैसे संभव है कि विश्व तेल उत्पादन में और इसलिए किसी देश के तेल आयातों में कमी आने से, उस देश में रोजगार तथा उत्पादन में वृद्धि हो जाए?

इसका जवाब यह है कि हम इसकी कल्पना कर रहे हैं कि तेल के घटे हुए आयात का पूरा असर, अंतिम उपभोग पर पड़ रहा होगा और इस तरह से यह एक प्रकार से आयात-प्रतिस्थापन का ही काम कर रहा होगा, जिसके चलते आयात के घटने से, घरेलू तौर पर उत्पादित मालों की मांग बढ़ जाएगी। इसका समग्रता में अर्थव्यवस्था पर बहुगुणनकारी प्रभाव पड़ेगा।

बेशक, अगर विश्व बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, लेकिन तेल उत्पादों की घरेलू कीमतें अपरिवर्तित रखी जाती हैं, तो घरेलू तेल उत्पादकों तथा वितरकों को उनके नुकसान को पाटने के लिए सब्सीडी देने की जरूरत होगी। लेकिन, अगर इस सब्सीडी के लिए वित्त पोषण राजकोषीय घाटे के जरिए करना पड़ रहा हो, तब भी यह अपने आप में चिंता का विषय नहीं होना चाहिए।

आइए, हम मान लेते हैं कि विश्व बाजार में तेल के दाम में 20 फीसद की बढ़ोतरी हुई है और देश में तेल के आयात में 10 फीसद कमी हो जाती है। उस सूरत में विदेशी तेल उत्पादकों के लिए, तेल के आयात की एवज में डालर भुगतान में 8 फीसद की ही बढ़ोतरी हो रही होगी। इसके लिए अतिरिक्त विदेशी मुद्रा तो हर सूरत में जुटानी ही पड़ेगी। मान लीजिए कि इसके लिए विदेशी मुद्रा, संचित विदेशी मुद्रा कोष से निकासी के जरिए जुटायी जाती है। उस सूरत में, अगर पहले वाले विकल्प को अपनाया गया हो, जहां कीमतें बढ़ायी जा रही हों, तेल उत्पादों के उत्पादक तथा वितरक, इस विदेशी मुद्रा को खरीदने के लिए आवश्यक रुपया संसाधन, उपभोक्ताओं से वसूल कर रहे होंगे। जबकि बाद वाले विकल्प के मामले में, जहां कीमतें नहीं बढ़ायी जा रही हों, वे सरकार से ये संसाधन हासिल कर रहे होंगे।

कीमतें बढ़ाना मंदी लाने वाला विकल्प है

तेल उत्पादों की कीमतों को अगर यथावत रखा जाता है तथा घरेलू तेल उत्पादकों तथा वितरकों को राजकोषीय घाटे के जरिए सब्सीडी दी जाती है, तो यह सीधे-सीधे विदेशी मुद्रा में खरीदी के बदले में, केंद्रीय बैंक के हाथों में सरकार के संसाधनों पर दावेदारी रखने का काम करेगा और/या इन तेल उत्पादक तथा वितरक कंपनियों के हाथों में सरकारी संसाधनों पर दावेदारी देने का काम करेगा, जिनमें सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यम भी शामिल हैं। यानी बाद वाले विकल्प को अपनाए जाने की सूरत में, बढ़ा हुआ राजकोषीय घाटा, सकल मांग को वित्तीय रूप से थामे रखने का काम करता है और मंदी को तो रोकता ही है, वास्तव में सकल रोजगार तथा उत्पाद में बढ़ोतरी भी संभव बनाता है। और चूंकि तेल उत्पादों के उपभोग की राशनिंग में अपेक्षाकृत संपन्न तबकों के ही अंतिम उपभोग पर अंकुश लगाया जा रहा होगा, तेल उत्पादों की कीमतें अपरिवर्तित रखने तथा राशनिंग का सहारा लेने से, न सिर्फ रोजगार में बढ़ोतरी हो रही होगी, बल्कि इसके ऊपर से मेहनतकश जनता के जीवन स्तर में कोई गिरावट नहीं हो रही होगी।

इस तर्क पर दो सवाल उठाए जा सकते हैं। पहला यह कि अगर तेल उत्पादों की राशनिंग के चलते, जो क्रय शक्ति बच रही होगी, उसको अन्य मालों की खरीद पर खर्च नहीं किया जाता है बल्कि बिना खर्च हुए ही रह जाती है (अर्थशास्त्रियों की भाषा में ‘बचत’ का रूप ले लेती है), उस सूरत में इससे रोजगार में बढ़ोतरी की बात तो लागू नहीं होगी। लेकिन, ऐसी स्थिति में सरकार हमेशा ही घरेलू तेल उत्पादकों तथा वितरकों को सब्सीडी देने के लिए जितना जरूरी हो, राजकोषीय घाटे में उससे ज्यादा बढ़ोतरी कर सकती है और इस तरह मांग तथा उत्पाद को बढ़ाने के लिए और खर्चा कर सकती है।

दूसरा सवाल यह कि संपन्नतर तबकों के तेल उत्पादों के अंतिम उपभोग पर अंकुश लगाने के लिए, इन उत्पादों की राशनिंग से हो सकता है कि इन उत्पादों की घरेलू मांग में इतनी कमी नहीं हो कि आपूर्ति मांग के बराबर हो जाए। लेकिन, जब एक बार हम इस नीतिगत रास्ते के तर्क को समझ लेते हैं, उसके बाद तेल उत्पादों की इस राशनिंग का संपन्नतर उपभोक्ताओं से आगे, प्रतिरक्षा क्षेत्र जैसे बड़े उपभोक्ताओं तक भी विस्तार किया जा सकता है। जाहिर है कि इस विस्तार के लिए समुचित विचार-विमर्श की जरूरत होगी और याद रहे कि 2013 में तेल उत्पादों की प्रतिरक्षा खरीद पर इस तरह की राशनिंग लागू भी थी। जाहिर है, राशनिंग से बचने वाले राजकोषीय संसाधनों का उपयोग सरकारी निवेश में किया जा सकता है, जिससे मांग और उत्पादन में बढ़ोतरी की जा सके।

मोदी राज को मंदी वाला रास्ता ही मंज़ूर है

लेकिन, ठीक इसी तरह की वैकल्पिक नीति का ही तो वैश्वीकृत वित्तीय पूंजी पूरी तरह से विरोध करती है। इसलिए, नव-उदारवादी निजाम में इसकी तो इजाजत ही नहीं है। तेल उत्पादों की राशनिंग करना, मेहनतकश जनता के जीवन स्तर की हिफाजत करना और इसके लिए राजकोषीय घाटे का सहारा लेना, यह सब अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी को हर्गिज मंजूर नहीं है। इसीलिए, हैरानी की बात नहीं है कि अंतर्राष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के अंगूठे के नीचे दबी भाजपा-नीत सरकार, करोड़ों गरीबों तथा मेहनतकशों का जीना मुहाल करने की कीमत पर, तेल उत्पादों की कीमतें बढ़ाती रहेगी और इसके साथ ही अर्थव्यवस्था में गंभीर मंदी के लिए दरवाजे और खोलती रहेगी।

मुद्रास्फीतिकारी मंदी के इस रास्ते पर चलते हुए, अकेली भारत सरकार ही नहीं, बल्कि पूंजीवादी दुनिया की अन्य अनेक सरकारें भी, उसी गलती को दोहरा रही हैं, जो इन पूंजीवादी सरकारों ने 1973-74 में पहले तेल धक्के के बाद की थी। उस तेल धक्के में तेल की कीमतों में भारी बढ़ोतरी हुई थी और इसका नतीजा यह हुआ था कि तेल की कीमतों में इस बढ़ोतरी से अपने तेल के खर्चे में बढ़ोतरी की भरपाई करने के लिए, सभी देशों को गैर-तेल आइटमों के अपने उपभोग पर खर्चों में भारी कटौती करनी पड़ी थी। इस तरह, तेल धक्के का असर मांग को सिकोड़ने वाला था, जिसकी काट करने के लिए आर्थिक विस्तारकारी राजकोषीय नीति अपनाए जाने की जरूरत थी। लेकिन, तेल की कीमतों में उस बढ़ोतरी का बोझ तो खरीददारों के सिर पर ही डाल दिया गया, जिसके चलते चौतरफा मुद्रास्फीति बढ़ गयी।

और चूंकि वित्तीय पूंजी की परंपरागत समझ यही कहती है कि जब भी मुद्रास्फीति आए, ‘‘कटौती’’ के कदमों को अपनाया जाना चाहिए, भले ही मुद्रास्फीति ‘‘मूल्य-धक्के’’ से पैदा हुई हो, जिसकी काट ‘‘कटौती’’ के बल पर की ही नहीं जा सकती है ; सरकारों को जो करना चाहिए था, उन्होंने उससे ठीक उल्टी नीति अपनायी। सरकारों ने अपने खर्चों में कटौती करना शुरू कर दिया। इसका नतीजा यह हुआ कि तेल-धक्के से जो जबर्दस्त मुद्रास्फीति आयी, उसके ऊपर से, 1975 में विश्व अर्थव्यवस्था गंभीर मंदी में चली गयी। वही गलती आज फिर दोहरायी जा रही है। ऐसी नीति अपनायी जा रही है, जिसके चलते हर जगह मेेहनतकशों को, महंगाई और मंदी, दोनों की मार झेलनी पड़ेगी।

ऐसा भी नहीं है कि तेल उत्पादों के अंतिम उपभोग की राशनिंग का विचार, भारत के लिए कोई पूरी तरह से अनजाना ही हो। पीकिंग तथा पेरिस जैसे शहरों में तो सामान्य दिनों में भी इस तरह की पाबंदियां लागू होती हैं कि सप्ताह के किन दिनों में, किस प्रकार की रजिस्ट्रेशन संख्या वाली गाड़ियां सड़कों पर निकलेंगी। खुद राजधानी दिल्ली में कुछ समय तक, सम और विषम नंबरों के हिसाब से गाड़ियों को अलग-अलग दिन निकालने की इजाजत देने का तजुर्बा किया गया था। उस समय मुख्य मकसद प्रदूषण को नीचे लाने का था, लेकिन बेहिसाब छूट दिए जाने के चलते उसमें तो इससे खास कामयाबी नहीं मिली, लेकिन इससे ईंधन के उपयोग में कुछ बचत जरूर हुई थी। कहने का आशय यह है कि राशनिंग के इस तरह के कदम सब की जानकारी में हैं और इन कदमों को खुद भारत में भी आजमाया जा चुका है। लेकिन, इस अनुभव के आधार पर आगे बढ़ने और इन कदमों का विस्तार कर उन्हें देश भर के लिए लागू करने के बजाए, भाजपा-नीत सरकार ने झटके से खरीददारों से वसूली जाने वाली कीमतें बढ़ा दी हैं। इसके मेहनतकशों के लिए गंभीर दुष्परिणाम होंगे।

(लेखक दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के आर्थिक अध्ययन एवं योजना केंद्र में प्रोफ़ेसर एमेरिटस हैं।)

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