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रायपुर-एम्स रायपुर ने 13 घंटे की जटिल हृदय सर्जरी से बच : एम्स रायपुर ने 13 घंटे की जटिल हृदय सर्जरी से बचाई 38 वर्षीय युवक की जान

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एम्स रायपुर ने 13 घंटे की जटिल हृदय सर्जरी से बचाई 38 वर्षीय युवक की जान

एक्यूट स्टैनफोर्ड टाइप-ए एओर्टिक डिसेक्शन जैसी दुर्लभ और जानलेवा स्थिति का सफल उपचार, 90 मिनट के भीतर शुरू हुई जीवनरक्षक शल्य चिकित्सा

प्रविष्टि तिथि: 11 JUN 2026 5:41PM by PIB Raipur

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) रायपुर के हृदय एवं वक्ष शल्य चिकित्सा विभाग ने एक अत्यंत जटिल और जानलेवा हृदय रोग से पीड़ित 38 वर्षीय युवक का सफल उपचार कर चिकित्सा क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। सरगुजा जिले के निवासी मरीज को “एक्यूट स्टैनफोर्ड टाइप-ए एओर्टिक डिसेक्शन” नामक दुर्लभ और गंभीर हृदय आपातकालीन स्थिति का सामना करना पड़ रहा था, जिसे चिकित्सा विज्ञान में सबसे खतरनाक हृदय संबंधी आपात स्थितियों में शामिल माना जाता है।

मरीज सीने में गंभीर दर्द और अन्य लक्षणों के साथ एम्स रायपुर पहुंचा। हृदय रोग विभाग की बाह्य रोगी सेवा (ओपीडी) में जांच के दौरान चिकित्सकों ने बीमारी की गंभीरता को भांपते हुए तत्काल विस्तृत परीक्षण कराए। इकोकार्डियोग्राफी और बाद में किए गए सीटी एओर्टोग्राम में एक्यूट स्टैनफोर्ड टाइप-ए एओर्टिक डिसेक्शन की पुष्टि हुई।

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यह ऐसी स्थिति होती है जिसमें शरीर की मुख्य रक्त वाहिका एओर्टा की भीतरी परत फट जाती है। समय पर उपचार न मिलने पर कुछ ही घंटों में मरीज की मृत्यु हो सकती है। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए हृदय रोग विभाग, हृदय एवं वक्ष शल्य चिकित्सा विभाग, कार्डियक एनेस्थीसिया, रेडियोलॉजी, गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू), नर्सिंग एवं तकनीकी टीमों ने तत्काल समन्वय स्थापित किया। निदान की पुष्टि होने के मात्र 90 मिनट के भीतर मरीज को ऑपरेशन थिएटर में ले जाकर जीवनरक्षक शल्य चिकित्सा प्रारंभ कर दी गई।

लगभग 13 घंटे तक चली इस जटिल सर्जरी के दौरान क्षतिग्रस्त एओर्टा को कृत्रिम ग्राफ्ट से प्रतिस्थापित किया गया तथा एओर्टिक वाल्व का सफल प्रत्यारोपण भी किया गया। शल्य चिकित्सा हृदय एवं वक्ष शल्य चिकित्सा विभाग की विशेषज्ञ टीम द्वारा संपन्न की गई, जबकि कार्डियक एनेस्थीसिया टीम ने पूरी प्रक्रिया के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सर्जरी के बाद मरीज की स्थिति लगातार बेहतर होती गई। ऑपरेशन के 24 घंटे के भीतर उसे वेंटिलेटर से हटा दिया गया। छह दिन तक कार्डियक आईसीयू में निगरानी के बाद उसे वार्ड में स्थानांतरित किया गया और ऑपरेशन के दसवें दिन स्वस्थ एवं स्थिर अवस्था में अस्पताल से छुट्टी दे दी गई।

हृदय एवं वक्ष शल्य चिकित्सा विभागाध्यक्ष डॉ. नितिन कुमार कश्यप ने बताया कि इस बीमारी में उपचार में प्रत्येक घंटे की देरी से मृत्यु का जोखिम 1 से 2 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। वहीं हृदय रोग विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यजीत ने कहा कि बीमारी की समय पर पहचान, त्वरित निर्णय और विभिन्न विभागों के उत्कृष्ट समन्वय के कारण मरीज का जीवन बचाया जा सका।

एम्स रायपुर की यह सफलता संस्थान की उन्नत हृदय शल्य चिकित्सा क्षमता और आपातकालीन चिकित्सा प्रबंधन की दक्षता को रेखांकित करती है। साथ ही यह भी दर्शाती है कि संस्थान छत्तीसगढ़ सहित आसपास के राज्यों के मरीजों को विश्वस्तरीय हृदय चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने में सक्षम है।

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